पंढरपुर की पावन दिव्य कथा
भक्त पुंडलिक और श्री विठ्ठल
पंढरपुर की पवित्र परंपरा के अनुसार, भगवान श्री विठ्ठल के प्रकट होने की कथा भक्त पुंडलिक की माता-पिता के प्रति सेवा और भक्ति से जुड़ी हुई है। पुंडलिक अपने माता-पिता की निष्ठापूर्वक सेवा करते थे। उनकी निःस्वार्थ सेवा और अटूट भक्ति से भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए, ऐसी श्रद्धा है।
जब भगवान श्रीकृष्ण पुंडलिक को दर्शन देने आए, उस समय पुंडलिक अपने माता-पिता की सेवा में व्यस्त थे। उन्होंने भगवान से कुछ समय प्रतीक्षा करने का निवेदन किया और उनके लिए एक ईंट आगे रख दी। भगवान श्रीकृष्ण उस ईंट पर खड़े हो गए और अपने हाथ कमर पर रखकर अपने भक्त की प्रतीक्षा करने लगे। इसी दिव्य स्वरूप को आगे चलकर श्री विठ्ठल के रूप में भक्तिभाव से पूजा जाने लगा।
इसी कारण पंढरपुर की भक्ति परंपरा में पुंडलिक को माता-पिता की सेवा और अटूट भक्ति का प्रतीक माना जाता है, जबकि श्री विठ्ठल को अपने भक्त की सच्ची भक्ति का उत्तर देने वाले करुणामय भगवान के रूप में पूजा जाता है।
जब भगवान श्रीकृष्ण पुंडलिक को दर्शन देने आए, उस समय पुंडलिक अपने माता-पिता की सेवा में व्यस्त थे। उन्होंने भगवान से कुछ समय प्रतीक्षा करने का निवेदन किया और उनके लिए एक ईंट आगे रख दी। भगवान श्रीकृष्ण उस ईंट पर खड़े हो गए और अपने हाथ कमर पर रखकर अपने भक्त की प्रतीक्षा करने लगे। इसी दिव्य स्वरूप को आगे चलकर श्री विठ्ठल के रूप में भक्तिभाव से पूजा जाने लगा।
इसी कारण पंढरपुर की भक्ति परंपरा में पुंडलिक को माता-पिता की सेवा और अटूट भक्ति का प्रतीक माना जाता है, जबकि श्री विठ्ठल को अपने भक्त की सच्ची भक्ति का उत्तर देने वाले करुणामय भगवान के रूप में पूजा जाता है।